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Saturday, September 28, 2019

औक़ात नहीं थी, दो शब्द लिखने की, वो संविधान (आरक्षण) मिटाने की बात करते हैं।


औक़ात नहीं थी, दो शब्द लिखने की,
वो संविधान (आरक्षण) मिटाने की बात करते हैं।
मज़दूरी कभी दी नहीं,
हमारे घर ज़लाने की बात करते हैं।
आरक्षण नहीं था तब क्यों,
मुग़लों से मार खाई थी।
कहाँ गई थी बहादुरी,
बेटियां उनसे जब ब्याही थीं।
हजार साल देश ग़ुलाम रहा,
तुम्हारी तलवारों में जंग लगा।
अब गरीबों पे तलवार,
चलानें की बात करते हैं।
दाहिर तो बामन था,
कासिम से क्यों हार गये।
तब तो नहीं था आरक्षण,
मुट्ठी भर अरबी, अफगानी
फिर क्यों मार गये।
महमूद गज़नी के सौ वीर,
सोमनाथ में कहर ढाया था।
आरक्षण वाला था कोई,
क्यों मंदिर बच पाया था।


समझ जिनमें खुद नहीं,
औरों को समझानें की बात करतें हैं।
आरक्षण नहीं था फौज़ में,
पृथ्वीराज क्यों हार गया,
मुँह ताकते रहे बहादुर,
गौरी उसको मार गया।
बाबर ने हराया सांगा को,
तब त़ो नहीं आरक्षण था।
तंतर मंतर काम आया,
भारी पड़ा एक-एक क्षण था।

आरक्षण नहीं था,
फिर क्यों अकबर से तुम डरते थे।
क्या मज़बूरी थी बतलाओं,
क्यों उसका हुक्का भरते थे।

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